मैं काम वासना से पागल-1

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जब मैं किशोरावस्था का था तब से मेरे मन मे लड़कियों के बारे मेँ लैंगिक आकर्षण चालू हुआ था .मैं हमेशा लड़की और सेक्स के बारे मे सोचने लगा . एक किशोर लडके के अंदर सेक्स के बारे मेँ जो जिज्ञासा होती है और उसे जानने के लिए वो जो भी करता है वह सब मैं करने लगा . मिसाल के तौर पर , लड़कियां और औरतों को चुपके से निहारना , उनके गदराये अंगो को देखने के लिए छटपटाना . उनके पहने हुए कपड़ो के अंदर के अंतर्वस्त्रों के रंग और पैटर्न जानने की कोशिश करना . चुपके से वयस्कों की फिल्में देखना , ब्लू -फ़िल्म देखना . अश्लील कहानियां पढ़ना वगैरा वगैरा . धीरे धीरे मेरे संपर्क मेँ रहने वाली और मेरे नजर मे आने वाली सभी लड़कियां और औरतों के बारे मे मेरे मन मेँ काम लालसा जागने लगी . मैं स्कूल की मेरे से बड़ी लड़कियां , चिकनी और सुन्दर मैडम , रास्ते पे जा रही लड़कियां और औरतें , हमारे अड़ोस पड़ोस मे रहने वाली लड़कियां और औरतें इन सब की तरफ काम वासना से देखने लगा . यहाँ तक कि मेरे रिश्तेदारी मेँ की कुछ लड़कियां और औरतों को भी मैं काम वासना से देखने लगा था .

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एक बार मैंने अपनी सगी बड़ी बहन संगीता दीदी को कपडे बदलते समय ब्रा और पैंटी मेँ देखा . जो मैंने देखा उसने मेरे दिल मेँ घर कर लिया और मैं काफी उत्तेजित भी हुआ . पहले तो मुझे शर्म आयी कि अपनी सगी बहन को भी मैं वासना भरी निगाह से देखता हूँ . लेकिन उसे वैसे अधनंगी अवस्था मे देखकर मेरे बदन मेँ जो काम लहरे उठी थी और मैं जितना उत्तेजित हुआ था वैसा मुझे पहले कभी महसूस नहीं हुआ था . बाद में मैं अपनी बहन को अलग ही निगाह से देखने लगा . मुझे एक बार चुदाई की कहानियों की एक हिंदी की किताब मिली . उस किताब मे कुछ कहानियां ऐसी थी जिनमें नजदीकी रिश्तेदारों के लैंगिक सम्बन्धो के बारे मेँ लिखा था . जिनमें भाई -बहन की चुदाई की कहानी भी थी जिसे पढ़ते समय बार बार मेरे दिल मे मेरी बहन , संगीता दीदी का ख़याल आ रहा था और मैं बहुत ही उत्तेजित हुआ था . वो कहानियां पढके मुझे थोड़ी तसल्ली हुई कि इस तरह के नाजायज सम्बन्ध इस दुनिया मेँ हैं और मैं ही अकेला ऐसा नहीं हूँ जिसके मन मेँ अपनी बहन के बारे मे कामवासना है.

मेरी बहन , संगीता दीदी , मेरे से 6 साल बड़ी थी . उसका एकलौता भाई होने की वजह से वह मुझे बहुत प्यार करती थी . काफी बार वो मुझे प्यार से अपने बाँहों मेँ भरती थी , मेरे गाल की पप्पी लेती थी . मैं तो उस की आँख का तारा था . हम एक साथ खेलते थे , हँसते थे , मजा करते थे . हम एक दूसरे के काफी करीब थे . हम दोनों भाई -बहन थे लेकिन ज्यादातर हम दोस्तों जैसे रहते थे . हमारे बीच भाई -बहन के नाते से ज्यादा दोस्ती का नाता था और हम एक दूसरे को वैसे बोलते भी थे . संगीता दीदी साधारण मिडिल-क्लास लड़कियों जैसी लेकिन आकर्षक चेहरेवाली थी . उसकी फिगर ‘सेक्सबॉम्ब ‘ वगैरा नहीं थी लेकिन सही थी . उसके बदन पर सही जगह ‘उठान ‘ और ‘गहराइयाँ ‘ थी . उसका बदन ऐसा था जो मुझे बेहद पागल करता था और हर रोज मुझे मूठ मारने के लिए मजबूर करता था . घर मेँ रहते समय उसे पता चले बिना उसे वासना भरी निगाह से निहारने का मौका मुझे हमेशा मिलता था . उसके साथ जो मेरे दोस्ताना ताल्लुकात थे जिसकी वजह से जब वो मुझे बाँहों मेँ भरती थी तब उसकी गदराई छाती का स्पर्श मुझे हमेशा होता था . हम कहीं खड़े होते थे तो वो मुझसे सट के खड़ी रहती थी , जिससे उसके भरे हुए सुडौल नितम्ब और बाकी नाजुक अंगो का स्पर्श मुझे होता था और उससे मैं उत्तेजित होता था . इस तरह से संगीता दीदी के बारे मे मेरा लैंगिक आकर्षण बढ़ता ही जा रहा था .

संगीता दीदी के लिए मैं उसका नटखट छोटा भाई था . वो मुझे हमेशा छोटा बच्चा ही समझती थी और पहले से मेरे सामने ही कपडे वगैरा बदलती थी . पहले मुझे उस बारे में कभी कुछ लगता नहीं था और मैं कभी उसकी तरफ ध्यान भी नहीं देता था . लेकिन जब से मेरे मन मे उसके प्रति कामवासना जाग उठी तब से वो मेरी बड़ी बहन न रहके मेरी कामदेवी बन गयी थी . अब जब वो मेरे सामने कपडे बदलती थी तब मैं उसे चुपके से कामुक निगाह से देखता था और उसके अधनंगे बदन को देखने के लिए छटपटाता था . जब वो मेरे सामने कपडे बदलती थी तब मैं उसके साथ कुछ न कुछ बोलता रहता था जिसकी वजह से बोलते समय मैं उसकी तरफ देख सकता था और उसकी ब्रा मेँ कसी गदराई छाती को देखता था . कभी कभी वो मुझे उसकी पीठ पर अपने ड्रेस की जिप लगाने के लिए कहती थी तो कभी अपने ब्लाउज के बटन लगाने के लिए बोलती थी . उसकी जिप या बटन लगाते समय उसकी खुली पीठ पर मुझे उसकी ब्रा की पट्टियां दिखती थी . कभी सलवार या पेटीकोट पहनते समय मुझे संगीता दीदी की पैंटी दिखती थी तो कभी कभी पैंटी मे भरे हुए उसके नितम्ब दिखाई देते थे . उसके ध्यान मेँ ये कभी नहीं आया की उसका छोटा भाई उसकी तरफ गंदी निगाह से देख रहा है . दीदी की ब्रा और पैंटी मुझे घर मेँ कही नजर आयी तो उन्हें देखकर मैं काफी उत्तेजित हो जाता था . ये वही कपडे है जिसमे मेरे बहन की गदराई छाती और प्यारी चूत छुपी होती है इस ख़याल से मैं दीवाना हो जाता था . कभी कभी मुझे लगता था की मैं ब्रा या पैंटी होता तो चौबीस घंटे मेरी बहन की चूचियों या चूत से चिपक के रह सकता था .

जब जब मुझे मौका मिलता था तब तब मैं संगीता दीदी की ब्रा और पैंटी चुपके से लेकर उसके साथ मूठ मारता था . मैं उसकी पैंटी अपने लंड पर घिसता था और उसकी ब्रा को अपने मुंह पर रखकर उसके कप चूसता था . जब मैं उसकी पहनी हुई पैंटी को मुंह मे भरकर चूसता था तब मैं काम वासना से पागल हो जाता था . उस पैंटी पर जहाँ उसकी चूत लगती थी वहां पर उसकी चूत का रस लगा रहता था और उसका स्वाद कुछ अलग ही था . मेरे खड़े लंड पर उसकी पैंटी घिसते घिसते मैं कल्पना करता था कि मैं अपनी बहन को चोद रहा हूँ और फिर उसकी पैंटी पर मैं अपने वीर्य का पानी छोड़ कर उसे गीला करता था . संगीता दीदी के नाजुक अंगो को छू लेने से मैं वासना से पागल हो जाता था और उसे छूने का कोई भी मौका मैं छोड़ता नहीं था .

हमारा घर छोटा था इसलिए हम सब एक साथ हाल मेँ सोते थे और मैं संगीता दीदी के बगल मेँ सोता था . आधी रात के बाद जब सब लोग गहरी नींद मेँ होते थे तब मैं संगीता दीदी के नजदीक सरकता था और हर तरह की होशियारी बरतते हुए मैं उससे धीरे से लिपट जाता था और उसके बदन की गरमी को महसूस करता था . उसके बड़े बड़े छाती के उभारो को हलके से छू लेता था . उसके नितम्बों को जी भर के हाथ लगाता था और उनके भारीपन का अंदाजा लेता था . उसकी जांघो को मैं छूता था तो कभी कभी उसकी चूत को कपडे के ऊपर से छूता था . मेरे मन में मेरी बहन के बारे में जो काम लालसा थी उस बारे मेँ मेरे माता , पिता को कभी कुछ मालूम नहीं हुआ . उन्हें क्या , खुद संगीता दीदी को भी मेरे असली खयालात का कभी पता न चला कि मैं उसके बारे मे क्या सोचता हूँ . मेरे असली खयालात के बारे मे किसी को पता न चले इसका मैं हमेशा ख्याल रखता था . मेरे मन मेँ संगीता दीदी के बारे में काम वासना थी और मैं हमेशा उसको चोदने के सपने देखता था लेकिन मुझे मालूम था कि हकीकत में ये असंभव है . मेरी बहन को चोदना या उसके साथ कोई नाजायज काम सम्बन्ध बनाना ये महज एक सपना ही है और वो हकीकत में कभी पूरा हो नहीं सकता ये मुझे अच्छी तरह से मालूम था . इसलिए उसे पता चले बिना जितना हो सके उतना मैं उसके नाजुक अंगो को छूकर या चुपके से देखकर आनंद लेता था और उसे चोदने के सिर्फ सपने देखता था .

जब संगीता दीदी 24 साल की हो गयी तब उसकी शादी के लिए लडके देखना मेरे माता , पिता ने चालू किया . हमारे रिश्तेदारों में से एक 33 साल के लडके का रिश्ता उसके लिए आया . लड़का पुणे मे रहता था . उसके माता , पिता नहीं थे . उसकी एक बड़ी बहन थी जिसकी शादी हो गयी थी और उसका ससुराल पुणे में ही था . अलग प्लाट पर लडके का खुद का मकान था . उसकी खुद की राशन की दुकान थी जिसे वो मेहनत कर के चला रहा था . संगीता दीदी ने बिना किसी ऐतराज के यह रिश्ता मंजूर कर लिया . लेकिन मुझे इस लडके का रिश्ता पसंद नहीं था . संगीता दीदी के लिए ये लड़का ठीक नहीं है ऐसा मुझे लगता था और उसकी दो वजह थी . एक वजह ये थी कि लड़का 33 साल का था यानी संगीता दीदी से काफी बड़ा था . शादी नहीं हुई इसलिए उसे लड़का कहना चाहिए नहीं तो वो अच्छा खासा अधेड़ उम्र जैसा आदमी था . इसलिए वो मेरी जवान बहन को कितना सुखी रख सकता है इस बारे मेँ मुझे आशंका थी . और उनकी उम्र के ज्यादा फरक की वजह से उनके ख़यालात मिलेंगे की नहीं इस बारे मेँ भी मुझे आशंका थी . सिर्फ उसका खुद का मकान और दुकान है इसलिए शायद संगीता दीदी ने उसके लिए हाँ कर दी थी . दूसरी वजह ये थी की उसके साथ शादी हो गयी तो मेरी बहन मुझसे दूर जाने वाली थी . उसने अगर मुंबई का लड़का पसंद किया होता तो शादी के बाद वो मुंबई मेँ ही रहती और मुझे उससे हमेशा मिलना आसान होता . लेकिन मेरी बहन की शादी की बारे मे मैं कुछ कर नहीं सकता था , ना तो मेरे हाथ मेँ कुछ भी था . देखते ही देखते उसकी शादी उस लडके से हो गयी और वो अपने ससुराल , पुणे मे चली गयी . उसकी शादी से मैं खुश नहीं था लेकिन मुझे मालूम था कि एक ना एक दिन ये होने ही वाला था . उसकी शादी होकर वो अपने ससुराल जाने ही वाली थी , चाहे उसका ससुराल पुणे मे हो या मुंबई में . यानी मेरी बहन मुझसे बिछड़ने वाली तो थी ही और मुझे उसके बिना जीना तो था ही .

Updated: May 9, 2018 — 10:53 pm
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