मैं काम वासना से पागल-2

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संगीता दीदी के जाने के बाद मैं उसके जवान बदन को याद कर के और उसकी कुछ पुरानी ब्रा और पैंटी हमारे अलमारी में पड़ी थी , उसका इस्तेमाल कर के मैं मूठ मारता था और मेरी काम वासना शांत करता था . दीदी हमेशा त्यौहार के लिए या किसी ख़ास दिन की वजह से मायके यानी हमारे घर आती थी और चार आठ दिन रहती थी . जब वो आती थी तब मैं ज्यादातर उसके आजु बाजू में रहता था . मैं उसके साथ रहता था , उसके साथ बातें करता रहता था . गए दिनों में क्या क्या , कैसे कैसे हुआ ये मैं उसे बताता रहता और उसके साथ हंसी मजाक करता था . इस तरह से मैं उसके साथ रहके उसको काम वासना से निहारता रहता था और उसके गदराये बदन का स्पर्श सुख लेता रहता था .

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शादी के बाद संगीता दीदी कुछ ज्यादा ही सुन्दर , सुडौल और मादक दिखने लगी थी . उसकी ब्रा , पैंटी चुपके से लेकर मैं अब भी मूठ मारता था . उसकी ब्रा और पैंटी चेक करने के बाद मुझे पता चला कि उनका नंबर बदल गया था . इसका मतलब ये था कि शादी कि बाद वो बदन से और भी भर गयी थी . अगर बहुत दिनों से संगीता दीदी मायके नहीं आती तो मैं उससे मिलने पुणे जाता था . मैं अगर उसके घर जाता तो दो चार दिन या तो एक हफ़्ता वहां रहता था . उसके पति दिनभर दुकान पर रहते थे . खाना खाने कि लिए वो दोपहर को एक घंटे कि लिए घर आते थे और फिर बाद में सीधा रात को दस बजे घर आते थे . दिनभर संगीता दीदी घर में अकेले ही रहती थी .

जब मैं उसके घर जाता था तो सदा उसके आसपास रहता था . भले ही मैं उसके साथ बातें करता रहता था या उसके किसी काम में मदद करता रहता था लेकिन असल में मैं उसके गदराये अंगो के उठान और गहराइयों का , उसकी साड़ी और ब्लाउज के ऊपर से जायजा लेता था . और इधर से उधर आते जाते उसके बदन का अनजाने में हो रहे स्पर्श का मजा लेता था . उसके कभी ध्यान में ही नहीं आयी मेरी काम वासना भरी नजर या वासना भरे स्पर्श ! उसने सपने में भी कभी कल्पना की नहीं होगी के उसके सगे छोटा भाई के मन में उसके लिए काम लालसा है .

शादी के बाद एक साल में संगीता दीदी गर्भवती हो गयी . सातवे महीने में डिलीवरी के लिए वो हमारे घर आयी और नवें महीने में उसे लड़का हुआ . बाद में दो महीने के बाद वो बच्चे के साथ ससुराल चली गयी . फिर तीन चार साल ऐसे ही गुजर गए और उस दौरान वो फिर से गर्भवती नहीं हुई . वो और उसका पति शायद अपने एक ही लडके से खुश थे इसलिए उन्होंने दूसरे बच्चे के बारे में सोचा नहीं .

इस दौरान मैंने मेरी स्कूल और कॉलेज की पढाई खत्म की और मैं एक प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करने लगा . कॉलेज के दिनों में कई लड़कियों से मेरी दोस्ती थी और दो तीन लड़कियों के साथ अलग अलग समय पर मेरे प्रेम संबंध भी थे . एक दो लड़कियों को तो मैंने चोदा भी था और उनके साथ सेक्स का मजा भी लूट लिया था . लेकिन फिर भी मैं अपनी बहन की याद में काम व्याकुल होता था और मूठ मारता था . संगीता दीदी के बारे में काम भावना और काम लालसा मेरे मन में हमेशा से थी . मेरे मन के एक कोने के अंदर एक आशा हमेशा से रहती थी कि एक दिन कुछ चमत्कार होगा और मुझे मेरी बहन को चोदने को मिलेगा .

मैं जैसे जैसे बड़ा और समझदार होते जा रहा था वैसे वैसे संगीता दीदी मेरे से और भी दिल खोल के बातें करने लगी थी और मुझसे उसका व्यवहार और भी ज्यादा दोस्ताना सा हो गया था . हम दोस्तों की तरह किसी भी विषय पर कुछ भी बातें करते थे या गपशप लगाते थे . आम तौर पे भाई -बहन लैंगिक भावना या कामजीवन जैसे विषय पर बातें नहीं करते है लेकिन हम दोनों धीरे धीरे उस विषय पर भी बातें करने लगे . हालांकि मैंने संगीता दीदी को कभी नहीं बताया कि मेरे मन में उसके लिए काम वासना है . यहाँ तक कि मेरे कॉलेज लाइफ कि प्रेमसंबंध या सेक्स लाइफ के बारे में भी मैंने उसे कुछ नहीं बताया . उसकी यही कल्पना थी कि सेक्स के बारे में मुझे सिर्फ कही सुनी बातें और किताबी बातें मालूम है .

समय गुजर रहा था और मैं 22 साल का हो गया था . संगीता दीदी भी 28 साल की हो गयी थी . संगीता दीदी की उम्र बढ़ रही थी लेकिन उसके गदराये बदन में कुछ बदलाव नहीं आया था . मुझे तो समय के साथ वो ज्यादा ही हसीन और जवान होती नजर आ रही थी . कभी कभी मुझे उसके पति से ईर्ष्या होती थी के वो कितना नसीबवाला है जो उसे संगीता दीदी जैसी हसीन और जवान बीवी मिली है . लेकिन असलियत तो कुछ और ही थी . मुझे संगीता दीदी के कहने से मालूम पड़ा कि वो अपनी शादीशुदा जिंदगी से खुश नहीं है . उसके बड़ी उम्र के पति के साथ उसका काम जीवन भी आनंददायक नहीं है . शादी के बाद शुरू शुरू में उसके पति ने उसे बहुत प्यार दिया . उसी दौरान वो गर्भवती रही और उन्हें लड़का हुआ . लेकिन बाद में वो अपने बच्चे में व्यस्त होती गयी और उसके पति अपने धंधे में उलझते गए . इस वजह से उनके कामजीवन में एक दरार सी पड़ गयी थी जिसे मिटाने की कोशिश उसके पति नहीं कर रहे थे . एक दूसरे से समझौता , यही उनका जीवन बन रहा था और धीरे धीरे संगीता दीदी को ऐसे जीवन की आदत होते जा रही थी . दिखने में तो उनका वैवाहिक जीवन आदर्श लगा रहा था लेकिन अंदर की बात ये थी कि संगीता दीदी उससे खुश नहीं थी .

भले ही मेरे मन में संगीता दीदी कि बारे में काम भावना थी लेकिन आखिर मैं उसका सगा भाई था इसलिए मुझे उसकी हालत से दुःख होता था और उस पर मुझे तरस आता था . इसलिए मैं उसे हमेशा तसल्ली देता था और उसकी आशाएँ बढ़ाते रहता था . उसे अलग अलग जोक्स , चुटकुले और मजेदार बातें बताते रहता था . मैं हमेशा उसे हंसाने की कोशिश करता रहता था और उसका मूड हमेशा आनंददायक और प्रसन्न रहे इस कोशिश में रहता था . जब वो हमारे घर आती थी या फिर मैं उसके घर जाता था , तब मैं उसे बाहर घुमाने ले जाया करता था . कभी शॉपिंग के लिए तो कभी सिनेमा देखने के लिए तो फिर कभी हम ऐसे ही घूमने जाया करते थे . कई बार मैं उसे अच्छे रेस्टारेंट में खाना खाने लेके जाया करता था . संगीता दीदी के पसंदीदा और उसे खुश करने वाली हर वो बात मैं करता था , जो असल में उसके पति को करनी चाहिए थी .

Updated: May 9, 2018 — 10:54 pm
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