मैं काम वासना से पागल-3

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एक दिन मैं ऑफिस से घर आया तो माँ ने बताया कि संगीता दीदी का फोन आया था और उसे दिवाली के लिए हमारे घर आना है . हमेशा की तरह उसके पति को अपनी दुकान से फुरसत नहीं थी उसे हमारे घर ला के छोड़ने की इसलिए संगीता दीदी पूछ रही थी कि मुझे समय है क्या , जा के उसे लाने के लिए . संगीता दीदी को लाने के लिए उसके घर जाने की कल्पना से मैं उत्तेजित हुआ . चार महीने पहिले मैं उसके घर गया था तब क्या क्या हुआ ये मुझे याद आया .

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दिनभर संगीता दीदी के पति अपनी दुकान पर रहते थे और दोपहर के समय उसका लड़का नर्सरी स्कूल में जाया करता था . इसलिए ज्यादातर समय दीदी और मैं घर में अकेले रहते थे और मैं उसे बिना झिझक निहारते रहता था . काम करते समय दीदी अपनी साड़ी और छाती के पल्लू के बारे में थोड़ी बेफिक्र रहती थी जिससे मुझे उसके छाती के उभारो की गहराइयाँ अच्छी तरह से देखने को मिलती थी . फर्शपर पोछा मारते समय या तो कपडे धोते समय वो अपनी साड़ी ऊपर कर के बैठती थी तब मुझे उसकी सुडौल टाँगे और जांघ देखने को मिलती थी .

दोपहर के खाने के बाद उसके पति निकल जाते थे और मैं हॉल में बैठकर टीवी देखते रहता था . बाद में अपना काम खत्म कर के संगीता दीदी बाहर आती थी और मेरे बाजू में दिवान पर बैठती थी . हम दोनों टीवी देखते देखते बातें करते रहते थे . दोपहर को दीदी हमेशा सोती थी इसलिए थोड़े समय बाद वो वही पे दिवान पर सो जाती थी .

जब वो गहरी नींद में सो जाती थी तब मैं बिना झिझक उसे बड़े गौर से देखता और निहारता रहता था . अगर संभव होता तो मैं उसके छाती के ऊपर का पल्लू सावधानी से थोड़ा सरकाता था और उसके उभारों की सांसो की ताल पर हो रही हलचल को देखते रहता था . और उसका सीधा , चिकना पेट , गोल , गहरी नाभि और लचकदार कमर को वासना भरी आँखों से देखते रहता था . कभी कभी तो मैं उसकी साड़ी ऊपर करने की कोशिश करता था लेकिन उसके लिए मुझे काफी सावधानी बरतनी पड़ती थी और मैं सिर्फ घुटने तक उसकी साड़ी ऊपर कर सकता था .

उनके घर में बंद रूम जैसा बाथरूम नहीं था बल्कि किचन के एक कोने में नहाने की जगह थी . दो तरफ में कोने की दीवार , सामने से वो जगह खुली थी और एक तरफ में चार फुट ऊंची एक छोटी दीवार थी . संगीता दीदी सुबह जल्दी नहाती नहीं थी . सुबह के सभी काम निपटाने के बाद और उसके पति दुकान में जाने के बाद वो आराम से आठ नौ के दरम्यान नहाने जाती थी . उसका लड़का सोता रहता था और दस बजे से पहले उठता नहीं था . मैं भी सोने का नाटक करता रहता था . नहाने के लिए बैठने से पहले संगीता दीदी किचन का दरवाजा बंद कर लेती थी . मैं जिस रूम में सोता था वो किचन को लगा के था . मैं संगीता दीदी के हलचल का जायजा लेते रहता था और जैसे ही नहाने के लिए वो किचन का दरवाजा बंद कर लेती थी वैसे ही मैं उठकर चुपके से बाहर आता था .

किचन का दरवाजा पुराने स्टाइल का था यानी उसमें वर्टीकल गैप थे . वैसे तो वो गैप बंद थे लेकिन मैंने गौर से चेक करके मालूम कर लिया था कि एक दो जगह उस गैप में दरार थी जिसमें से अंदर का कुछ भाग दिख सकता था . नहाने की जगह दरवाजे के बिलकुल सामने चार पांच फुट पर थी . दबे पांव से मैं किचन के दरवाजे में जाता था और उस दरार को आँख लगाता था . मुझे दिखाई देता था कि अंदर संगीता दीदी साड़ी निकाल रही थी . बाद में ब्लाउज और पेटीकोट निकालकर वो ब्रा और पैंटी पहने नहाने की जगह पर जाती थी . फिर गरम पानी में उसे चाहिए उतना ठंडा पानी मिलाके वो नहाने का पानी तैयार करती थी .

फिर ब्रा , पैंटी उतारकर वो नहाने बैठती थी . नहाने के बाद वो खड़ी होकर टॉवेल से अपना गीला बदन पौंछती थी . फिर दूसरी ब्रा , पैंटी पहन के वो बाहर आती थी . और फिर पेटीकोट , ब्लाउज पहन के वो साड़ी पहन लेती थी . पूरा समय मैं किचन के दरवाजे के दरार से संगीता दीदी की हरकते चुपके से देखता रहता था . उस दरार से इतना सब कुछ साफ साफ दिखाई नहीं देता था लेकिन जो कुछ दिखता था वो मुझे उत्तेजित करने के लिए और मेरी काम वासना भड़काने के लिए काफी होता था .

Updated: May 9, 2018 — 10:57 pm
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